भारत में Tik-Tok पर बैन, सुप्रीम कोर्ट ने स्टे देने से किया इंकार

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सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को मद्रास हाईकोर्ट के उस आदेश पर रोक लगाने से इंकार कर दिया, जिसमें केंद्र को Tik Tok नामक प्रचलित ऐप पर बैन लगाने का निर्देश दिया गया था। आरोप था कि इस ऐप के माध्यम से अश्लीलता परोसी जा रही है।

शीर्ष अदालत ने कहा कि प्रतिबंध निर्देश सिर्फ एक अंतरिम आदेश था और उच्च न्यायालय 16 अप्रैल को इस मामले की सुनवाई करने वाला है।

मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई और जस्टिस दीपक गुप्ता और संजीव खन्ना की पीठ ने कहा कि वह इस मुद्दे को आगे के फैसले के लिए खुला रख रही है और 22 अप्रैल को इस पर विचार करेगी।

चीनी कंपनी बाइटडांस की ओर से पेश वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि मोबाइल ऐप के बिलियन से अधिक डाउनलोड हो चुके हैं और मद्रास उच्च न्यायालय की मदुरै पीठ ने पूर्व पक्ष के आदेश पारित किए हैं। उन्होंने कहा कि अदालत ने मामले में न ही तो नोटिस जारी नहीं किया और न ही उनकी बात सुनी। बल्कि उनकी बात सुने बिना ही आदेश पारित कर दिया गया।

इस आरोप पर पीठ ने कहा कि उच्च न्यायालय पहले ही मामले को जब्त कर चुका है और प्रतिबंध आदेश सिर्फ एक अंतरिम आदेश था। पीठ ने कहा कि हम इस मामले को बंद नहीं कर रहे हैं। कृपया उच्च न्यायालय ने मामले की सुनवाई करने दे।

उच्च न्यायालय ने 3 अप्रैल को "अश्लील और अनुचित सामग्री" फैलाने का आरोप लगते हुए केंद्र को मोबाइल एप्लिकेशन "TIk-Tok" पर प्रतिबंध लगाने का निर्देश दिया था। साथ ही अदालत ने मीडिया को भी आदेश दिया कि Tik-Tok के द्वारा बनाई गई वीडियो क्लिप का प्रसारण न करे।

उच्च न्यायालय ने सरकार के सामने प्रस्ताव रखा कि क्या वह अमेरिका में बच्चों के ऑनलाइन प्राइवेसी प्रोटेक्शन एक्ट की तर्ज पर कोई कानून बनाएगी? और साथ ही मामले को 16 अप्रैल को आगे की सुनवाई के लिए पोस्ट कर दिया।

उच्च न्यायालय का अंतरिम आदेश एक जनहित याचिका (पीआईएल) पर आया, जिसमें आरोप लगाया गया कि ऐप के माध्यम से संस्कृति को अपमानित किया जा रहा है और साथ ही अश्लील साहित्य को भी प्रोत्साहित किया जा रहा है।

उच्च न्यायालय ने निराशा जताते हुए कहा कि ब्लू व्हेल ऑनलाइन गेम के कारण हुए हादसे के बाद भी, जिसमें कथित तौर पर कई लोगों ने आत्महत्या की, अधिकारियों ने यह नहीं सीखा कि उन्हें इस प्रकार की समस्याओं के प्रति सचेत रहना चाहिए।

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