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शिकारी और शिकार

शिकारी और शिकारCommunal Murder increase by Semitic Religion in World

बब्बर शेर जब शिकार करते है तब झुण्ड में चलते हैं। उनके शिकार अमूमन बड़े शाकाहारी प्राणी होते हैं।
जब वे किसी शिकार प्रजाति का झुण्ड देखते हैं तो तुरंत हमला नहीं करते। शेरों की टोली के सदस्य एक योजनाबद्ध तरीके से जाल बिछाते हैं, और जब सारी तैय्यारी हो जाती है तब एक शेर अचानक उठ खडा होता है।
ध्यान रहे कि शेरों की पहली निशानी जब तक शिकार को पता चलती है तब तक तो उस के आखेट की सारी तैय्यारी हो चुकी होती है। यह गड़बड़ की पहली निशानी नहीं होती है, लगभग तय विनाश के योजना की पहली दृश्य कड़ी होती है।
जब इससे बौखलाए शिकार झुण्ड के सदस्य इस खतरे से दूर होने की कोशिश करते हैं, तब वह कोशिश बेतरतीब होती है। झुण्ड का हर सदस्य अपनी जान बचाने के लिए दौड़ पड़ता है. कितने हमलावर है, कहाँ-कहाँ स्थित है, किस दिशा में दौड़ना चाहिए, इस का ख़ास ध्यान नहीं रखा जाता है - बस दौड़ कर पीछे वाले हमलावर से जान छुडाना, और अपने संगियों से दो पग दूर रहना ही लक्ष्य होता है। इस से तय हो जाता है कि कोई न कोई तो मरेगा - झुण्ड का हर सदस्य यह सुनिश्चित करने में लगा होता है कि वह मरने वाला जीव वह स्वयं न हो। नितान्त व्यक्तिवादी सोच का परिचय वहीँ साक्षात हो जाता है।
जब शेर किसी शिकार को पकड़ लेता है तो पहले उसे दौड़ने से रोकता है। इस के लिए वह जो कोई भी अंग जबड़े में आ सके, पकड़ कर बैठ जाता है, और 150-200 किलो भार का शेर यदि पीछे खींचने पर आमादा हो जाए तो 500 किलो वजन का भैंसा भी आगे बढ़ नहीं पाता। नीलगाय, विल्डरबीस्ट, हिरन जैसे छोटे जीव का तो कहना ही क्या! जब शिकार के समझ में आता है कि पकड़ से छूटना, दौड़कर जान बचाना असंभव है, तब वह बड़ा करुण स्वर में रम्भाना शुरू करता है - कि मेरे साथियों, आओ, इस विपदा से मुझे छुड़ाओ।
भैंसे ऐसे कुछ जीव है जो अपने साथियों की सुनते है - जब उन्हें लगे कि मुक्तता कराना उन के बस में है, और इस में किसी और की जान जाने का खतरा नहीं है।
पर हिरन, ज़ेब्रा, नीलगाय, विल्डरबीस्ट जैसे छोटे प्राणी कभी साथी को छुडाने नहीं आते - वे देख लेते है कि एक साथी पूरी तौर से फंसा है, और उस की जान जाना तय है। इस बात को वे इस तरह से लेते है कि बधाई हो, खुद की जान बच गई है। शेर अब शिकार को खाएंगे, और दिनभर सुस्ताएंगे। इन शेरों से अब एक दिन के लिए कोई खतरा नहीं है और वे आश्वस्त, उन शेरों के सामने ही आराम से घास चरने में लग जाते हैं। शेर भी जानते हैं कि घास खा रहे हैं तो उस से पुष्ट मांस हमारा कल का भोजन ही तो है। वे भी उन की ओर देख कर उन्हें अनदेखा करते हैं, कल का भोजन आज खुद पक्व हो रहा है, सो चिंता किस बात की!
इसी स्थिति को क़ानून और सुव्यवस्था का नाम है। लेकिन क़ानून भारतीय संविधान का नहीं, जंगल का क़ानून - एक के लिए "जिओ और शिकार मार डालो, खाओ!" और दुसरे के लिए "खाओ, खौफ में जिए जाओ, और एक दिन शिकारी को अपने मेहनत का फल और जान, दोनों लेने दो, एक दर्दनाक मौत पाओ"।
हम यूं ही समझते हैं कि भारत के जंगल सिमट रहे हैं। वे तो फैल रहे हैं, और आप के गली के नुक्कड़ पर उस का एक टुकड़ा पलता और फैलता दिखाई दे सकता है।
मेरे घर से महज सौ मील की दूरी पर, अलीगढ के पास कासगंज में ऐसा ही एक जंगल का टुकड़ा पल रहा है, और परसों पता नहीं क्यों तीन हिरन एक साथ मार दिए गए!

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